गुनहु लखन कर हम पर रोसू।
कतहु सुधाईहु ते बड़ दोसू ।।
श्री राम जी कहते है कि, दोष लक्ष्मण का है आप मुझे मेरी सहजता, सरलता पर क्रोध कर रहे हैं।
शौर्य से भ्रम का निवारण
श्री राम जी को शालीनतापूर्वक तेजस्वी ढंग से प्रतिवाद करना पड़ा। अपने शौर्य, साहस, दृढ़ता का परिचय देकर श्री परशुराम जी का भ्रम दूर किया। समाज में कुछ ऐसे तत्व भी होते हैं जो सौम्यता एवं सज्जनता की भाषा समझते ही नहीं हैं, ऐसे दुष्ट तत्वों को दण्ड देना हर समाज निष्ठ का कर्तव्य हो जाता है।
समुद्र प्रसंग और श्री राम का रौद्र रूप
उन्हें भाग्य भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। लंका विजय हेतु सेतु बंध से पूर्व उपाय खोजा गया, कि देव की इच्छा होगी तो समुद्र मार्ग अवश्य दे देगा, यह लक्ष्मण के अच्छा नहीं लगा, वह उत्तेजित होने लगे, उन्होंने उत्तेजित होकर कहा:
कायर मन को एक अधारा ।
देव देव आलसी पुकारा।।
इस भाव से श्री राम जी असहमत थे, उन्होंने चाहा कि श्रेष्ठ कार्य के लिए समुद्र अवश्य सहायता करेगा, लेकिन यह हुआ. विनय ना मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय ना प्रीत।।
अब श्री राम जी उत्तेजित होकर बोले,
लक्ष्मण बाम सरासर आनु।
सोको बारिध विसिख समानू।।
यहाँ पर जब विनय से कार्य सफल नहीं हुआ, तब प्रभु श्रीराम का अपना रौद्र रूप समुद्र को दिखाना पड़ा। श्री राम जी ने अनीति एवं अत्याचार को कभी सहन नहीं किया, पीड़ितों के प्रति उनकी करुणा उभरती है, तथा दुष्टों के प्रति रोष में बदल जाती है।
निसिचर हीन करहुं महि, भुज उठाय प्रण कीन।
सकल मुनिन के आश्रममन्हि, जाइ जाइ सुख दीन।।
शिक्ति की पूजा आदि काल से होकर, वर्तमान में भी होती है एवं भविष्य में होगी, बलहीनों को कोई नहीं पूछता, बलवानों को ही विश्व पूजता है, यह कहावत चरितार्थ है, इसीलिए शिक्ति संचयन में मनुष्य की भूमिका अति महत्वपूर्ण है।
सत्य, मानवता एवं त्याग के प्रति मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम जी को कोटि कोटि प्रणाम।